योग क्या है?
अर्थात - 'चित्तवृत्तियों' को रोकना ही योग है। चित्त में उठने वाली विचार तरंगों को वृत्ति (भंवर) कहते हैं। इन वृत्तियों को रोकना ही योग कहलाता है।
वैसे 'योग' का शाब्दिक अर्थ है - जोड़। वास्तव में यह योग भी जोड़ना ही है। किसे जोड़ना है? किससे जुड़ना है? यह प्रश्न उठने स्वभाविक है।
योग का परिणाम होता है - आत्मा और परमात्मा का संबंध हो जाना। अतः यह आत्मा का परमात्मा से योग जुड़ना है।
मन बड़ा चंचल है। यह जिस इंद्रिय से संयुक्त होता है उसी के द्वारा बाह्य विषयों का हम ज्ञान करते हैं। किसी वस्तु को हम देख रहे हैं। वह वस्तु हमारी आंखों के सामने होती है। बाहरी तंत्र उस विषय को मस्तिष्क के अंदर इंद्रिय तक भेजते हैं और इंद्रिय उसे मन को और मन निश्चयात्मिका बुद्धि के पास भेजता है। तब पुरुष या आत्मा उसे ग्रहण करता है। यह सब कार्य क्षणभर में हो जाता है।
यह जो मन भी भौतिक शरीर के अन्य यंत्रों की भांती जड़ है किंतु इसको सूक्ष्म होने तथा आत्मा के हाथों का यंत्र होने के कारण यह चेतन सा लगता है। मन के द्वारा आत्मा बाहरी विषयों को ग्रहण करती हैं। मन परिवर्तनशील है। इधर से उधर दौड़ता रहता है। यह कभी सभी इंद्रियों से लगा रहता है तो कभी एक से। कभी किसी से नहीं।
योग के द्वारा योगी प्रयत्न करते हैं कि वह अपने को ऐसा सूक्ष्म अनुभूति संपन्न कर ले जिससे वे विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष कर सके।
हमारा यह मन चेतन आत्मा के साथ होने के कारण चेतन सा प्रतीत होता है। आत्मा मनुष्य का असल स्वरूप है। हमारा यह मन तो एक यंत्र मात्र है। मन में उसी चेतन आत्मा की चेतनता है जब तक आत्मा एक दृष्टा के रूप में इसके पीछे हैं तभी तक यह चेतन स्वरूप है जब मनुष्य किसी प्रकार इस मन का त्याग कर देता है तो मन फिर नहीं रहता।
इसी मन का उपादान स्वरूप है 'चित्त'।
और इस चित्त में उठने वाली तरंगें है 'वृत्तियां'।
हम और आप किसी तलाब पर जाए और उसके तल को देखने का प्रयास करें।
तल दिखाई क्यों नहीं देता?
कारण यही है कि जल निर्मल नहीं है। और उसमें लहरें हैं, जल शांत नहीं है।
यदि जल पूर्ण रूप से साफ, निर्मल है, उसमें एक भी लहर या तरंग नहीं है तो यह निश्चित बात है कि हम तालाब के तल को देख लेंगे।
यह चित्त भी मानो वह तालाब है और हमारा वास्तविक रूप वह तल है। यह वृत्ति या ही लहरें हैं। मन का अज्ञान और अपवित्रता वह गंदला पन है। यह सब ना रहे तो अपने वास्तविक रूप को देखा जा सकता है।
'योग' इन्हीं वृत्तियों या लहरों को वश में करने या रोकने का विज्ञान है।
'योग' चूकी मेल मिलाप या जोड़ना है। आत्मा परमात्मा का मिलना है इसलिए योगी स्वयं को परमात्मा के निकट जानकर सबको उसी परमपिता की संतान या अंश मानता है। वह सब प्राणियों को आत्मवत देखता है। योगी सबसे हिला-मिला या सबको अपने जैसा ईश्वर पुत्र मानकर किसी को दुख नहीं देता। सब से प्रेम करता है। उनके मन से पाप की भावना, दुख, क्रोध, कष्ट दूर हो जाते हैं। और संपूर्ण व्यक्तित्व योगाग्नि से तप कर शुद्ध हो जाता है। यही तो 'योग' है।
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